श्यामा प्रसाद मुख़र्जी बायोग्राफी shyama prasad mukherjee biography in hindi

By | June 24, 2018

श्यामा प्रसाद मुख़र्जी बायोग्राफी shyama prasad mukherjee biography in hindi भारत के कई नौजवान नहीं जानते कौन है श्यामा प्रसाद मुख्रर्जी ,  भारत के प्रति क्या योगदान है  . श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1 9 51 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ की स्थापना की और वह इसके पहले प्रेजिडेंट बने। 1952 के चुनावों में, भारतीय जनसंघ ने sansad में 3 सीटें जीतीं उनमें से एक श्री shyama मुखर्जी की अपनी सीट थी । उन्होंने संसद के भीतर राष्ट्रीय डेमोक्रेटिक पार्टी का गठन किया था जिसमें सांसदों के 32 members  और राज्य सभा के दस मेंबर शामिल थे, हालांकि स्पीकर द्वारा विपक्षी दल के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं थी .

shyama prasad mukherjee biography in hindi

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श्यामा प्रसाद मुख़र्जी  परिचय :-

जनम – 6 जुलाई 1901
जनम स्थान – कोलकाता
पिता का नाम – सर आशुतोष मुखर्जी
अर्धांगिनी – सुधा देवी
मृत्यु – 23 जून 1953 (उम्र 51)

श्यामा प्रसाद मुख़र्जी जीवनी :-

डॉ मुख्रर्जी जी के जनम के समय भारत गुलामी की बेड़िओं में जकड़ा हुआ था , ब्रिटिश सरकार के जुलम जनता में आक्रोश की ज्वाला भड़का रहे थे , डॉ॰ मुखर्जी के पिता ji शिक्षक के रूप में विख्यात थे उनकी प्रतिभा के अंश श्यामा प्रसाद मुख्रर्जी में देखने को मिलते थे . श्यामा प्रसाद जी ने मीट्रिक की परीक्षा 1917 में उत्तीर्ण की उसके बाद 1921 में स्नातक की डिग्री हासिल की .

बीए करने के बाद 1923 में उन्होंने लॉ की उपाधि प्राप्त करने के पश्चात् वो इंग्लैण्ड चले गए 1926 में वहां से बेरिस्टर बनकर भारत लोटे .अपने पिता के आदर्शों पर चलते हुए बहुत छोटी उम्र में शिक्षा के और अध्यापन के क्षेत्र में लोकप्रियता हांसिल कर ली थी .अपनी Eligibility के बल पर वे ३३ वर्ष की आयु में विश्वविद्यालय के कुलपति बना दिए गए .

श्यामा प्रसाद मुख़र्जी की राजनीतक उपाधियाँ :- 

डॉ मुखर्जी ने मानवता के कल्याण लिए राजनीती में प्रवेश किया। उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करने वाले कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में बंगाल की विधान परिषद के सदस्य के रूप में निर्वाचित किया गया, लेकिन कांग्रेस ने विधायिका का बहिष्कार करने का फैसला किया,उन्होंने अगले वर्ष इस्तीफा दे दिया। इसके बाद, उन्होंने स्वतंत्र चुनाव लड़ने का फैंसला किया और उन्होंने जीत हासिल की .

ब्रिटिश सरकार की देख रेख में मुस्लिम लीग ,बंगाल में साम्प्र्दायिक दंगे भड़का रही थी ,बहां का माहौल इतना ज्यादा भयानक हो चूका था की जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती।नौबत बिभाजन तक आ गयी थी श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल के हिन्दुओं का साथ दिया और अपनी विशिष्ट राजनीती का परिचत देते हुए उन्होंने बंगाल के बिभाजन को रोका , उन्होंने मुस्लिम लीग की कुचालों को safal नहीं होने दिया

मजहबी बटवारे के विरोधी थे डॉ मुखर्जी :-

श्यामा parsad  एक धार्मिक वियक्तित्व के व्यक्ति थे ,उनका मानना था हम सब एक है HINDU मुस्लिम में कोई भेद नहीं होना चाहिए , आधार पर देश के बटवारे के वो पुरजोर विरोधी थे .उनका मन्ना था हमारी language  एक ,culture एक ,विरासत एक फिर भी मजहबी बटवारा क्यों ,इस बात को  कई राजनितिक पार्टिओं ने गलत तरीके से पेश किया इन सब विरोधो के वावजूद UNKI  प्रसिद्धि बढ़ती गयी लोग उनको पसंद करते थे ,

1946  में मुस्लिम लीग ने अपना असली और भयानक रूप दिखा दिया हजारों निर्दोष हिन्दुओं का कत्लेआम कर दिया .ये देख कोन्ग्रेजी नेता भी डरे हुए थे .कांग्रेस पार्टी और बिरिटीश सरकार दोनों ने मिलकर secret तरीके से भारत के बिभाजन की योजना बना ली , यहाँ कांग्रेस ने अपने सभी बादों को दरकिनार कर दिया जो कहते थे हम भारत का बिभाजन नहीं होने देंगे .

अगर प्रसाद मुखर्जी न होते तो आज पंजाब और बंगाल भारत में न होते , उनके प्रयासों से आधा पंजाब और आधा बंगाल भारत के हिस्से में आये आज़ादी के बाद उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया ,बहुत जल्दी उन्होंने नयी सरकार की कुटिलता को समझ लिया इस लिए उन्होंने  6 अप्रैल 1950 मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया .

जनसंघ की स्थापना :- 

आरएसएस के श्री गोलवलकर गुरुजी के परामर्श के बाद श्री मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1 9 51 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ की स्थापना .डॉ श्यामा जी चाहते थे जम्मू kashmeer  से धारा 370 हटा दी जाये। और घाटी को bharat  का अभिन्न अंग बना दिए जाने के पक्ष मे थे .वो भविष्य को भांप गए थे , उनका सोचना था की अगर Jammu कश्मीर से dhara  370 न हटी तो आगे चल कर देश की अखंडता को खतरा पैदा कर सकती है

श्यामा प्रसाद की अटल प्रतिज्ञा :- 

1952  में एक रैली को सम्बोधित करते हुए उन्होंने जम्मू के लोगो से कहा था की या तो मैं आपको भारत के सविधान में लाऊंगा या इस उदेश्य पूर्ति के मार्ग में अपने प्राण त्याग दूंगा .

उन्होंने कांग्रेस पार्टी और नेहरू सरकार को चुनौती दी के वो अगर रोक सकती है तो रोक के दिखाए ,उनका संकल्प दृढ़ था 1953 में परमिट के बिना वो जम्मू कश्मीर पड़े , राज्य में प्रवेश करते ही 11 मई 1953 को उन्हें गिरफ्तार कर के नज़रबंद का दिया गया ,फिर 23 जून 1953 को 51 वर्ष की उम्र में unka  अज्ञात परस्थिति में स्वर्ग वास  हो गय|

 

 

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