स्वामी दयानन्द सरस्वती  एक महान हिन्दू

स्वामी दयानन्द सरस्वती एक महान हिन्दू




जयंती 10 फरबरी 2018

स्वामी दयानन्द सरस्वती एक महान समाज सुधारक देश भगत ,तथा आध्यात्मिक चिंतक थे ,इतिहास गवाह है  जब भी कोई आत्म ज्ञानी संत इस धरा पर आया है तो लोगो ने उनका विरोध भी बहुत ज्यादा किया , सुकरात को जहर दिया गया , स्वामी विवेकानद को भी जहर दिया गया , मीरा को जहर दिया गया ,स्वामी दयानन्द जी को भी कुछ इसी तरह की यातना दी गयी .कारण ये के आत्म ज्ञानी संत कभी झूठ को सच नहीं कहते, कभी किसी दुष्ट प्रवृति के वियक्ति की जी हजूरी नहीं करते ,सत्य चाहे कितना भी कड़वा को आत्म ज्ञानी सिर्फ सत्य का साथ देगा उनकी नज़र में ,अमीर गरीब .ऊंच नीच सब एक समान है , धन का प्रलोभन उनको अपने मार्ग से हटा नहीं सकता .

स्वामी दयानन्द सरस्वती एक महान समाज सुधारक

राम कृष्ण परमहंस




 

स्वामी जी ने हमेशा आध्यात्मिक और समाजिक बुराइओं का खंडन किया छुआछूत, नर बलि, धार्मिक संकीर्णता , बाल विवाह के विरुद्ध उन्होंने खुल कर आवाज़ उठायी ,स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म गुजरात के भूतपूर्व मोरवी राज्य के टकारा गाँव में 12 फरवरी 1824 को हुआ उनका बचपन का नाम मूल शंकर था ,

उनकी माता का नाम अमृता बाई तथा पिता का नाम अम्बा शंकर तिवारी था .उनके पिता क्लैक्टर थे ,इस लिए उनके परिवार में कभी धन में कमी न आयी , मूलशंकर बचपन से आध्यात्मिक प्रवृति के थे ,व्राह्मण परिवार होने के कारण उनके घर में पूजा पाठ धार्मिक अनुष्ठान होते रहते थे ,एक दिन की घटना ने उनके जीवन की दिशा ही मोड़ दी उनको अंदर आत्म ज्ञान प्राप्ति की जिज्ञासा जाग गयी ,उस एक घटना ने उनके मन में सत्य की खोज के लिए प्रेरित किया .

ये घटना शिवरात्रि की है ,उस दिन उनके परिवार में धूम धाम से इस उत्सव को मनाया जा रहा था सबने उपवास रखा हुआ था , समीप के मंदिर में जागरण के बाद सभी ने भगवान को भोग लगाया और बापिस चले गए लेकिन स्वामी जी रात्रि में वही रुक गए ,रात को उन्होंने देखा के चूहे भगवान को चढ़ाया हुआ प्रसाद खा रहे है ,ऐसा देख कर उनके मन में अजीब से सवाल पैदा होने लगे के क्या यही भगवान है या सत्य कुछ और है जिसको खोजना बाकि है ,ईश्वर है भी या नहीं ,ऐसे कई सवाल मन में लेकर वो सुबह जल्दी बापिस आ गए ,

अब तक उनके मन में ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन की जिज्ञासा जाग चुकी थी ,उन्होंने धार्मिक ग्रन्थ ,को अध्ययन शुरू कर दिया ,वेद ,पुराण ,शाह्स्त्र , उपनिषध ,उन्होंने कंठस्थ याद कर लिए ,अब तक कई वर्ष वीत चुके थे ,वो जान चुके थे के ईश्वर के ईश्वर को इसी घट प्राप्त किया जा सकता है ,लेकिन उनकी खोज अभी भी अधूरी थी जिस कारण उन्होंने वेदो का ध्यान किया वो अभी पूरा नहीं हुआ था उनको ईश्वर के प्रकाश रूप के दर्शन नहीं हुए थे ,

स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की दीक्षा तथा समाधी की प्राप्ति 

कुछ समय पश्चात् उन्होंने स्वामी बिरजानन्द जी का नाम सुना ,स्वामी बिरजानन्द जी आत्म ज्ञानी और समाधिष्ठ संत थे ,मूलशंकर ने सोचा के अब यही आखरी मार्ग है ,ईश्वर की प्राप्ति का मूल शंकर चल पड़े स्वामी बिरजानन्द के आश्रम की और

मूल शंकर स्वामी बिरजानन्द जी के आश्रम के बाहर खड़े हो गए ,अंदर से आवाज़ , मूल शंकर तू आ गया ,बाहर क्यों खड़ा है भीतर आ जा ,मूलशंकर जी भीतर गए तो देखा स्वामी बिरजानन्द जी समाधि में बैठे थे ,उन्होंने स्वामी जी को परनाम किया और समीप बैठ गए जब बृजनान्द जी समाधि से बाहर आये तो मूल शंकर से जो पहला सवाल किया के आपको कैसे पता माई आया और मेरा नाम आपको कैसे पता ,

बृजनान्द जी मुस्कुराये और कुछ न बोले ,फिर मूल शंकर ने कहा के स्वामी जी मैंने धार्मिक ग्रंथो का अध्ययन किया ,कंठस्थ किया लेकिन आज तक ईश्वर का साक्षात्कार नहीं हुआ .

स्वामी बृजनान्द जी ने मूलशंकर को दीक्षा दी और ध्यान समाधि की बिधि सिखाई ,अब मूलशंकर बृजानंद जी के आश्रम में रहकर निरंतर ध्यान करने लगे ,और जो बाकि समय होता उस समय वो वेदो का अध्ययन करते ,बहुत जल्द वो समाधी में उतर गए ,अब उनके मन में करुणा ,दया जैसे सात्विक भाव प्रकट हो गए ,जिस कारण गुर जी ने उनका नाम स्वामी दयानन्द रख दिया ,क्यों के सरस्वती की कृपा से वो बहुत जल्दी किसी भी शास्त्र को कंठस्थ कर लेते थे इस लिए उनके नाम के साथ स्वामी दयानद सरस्वती रख दिया .




स्वामी दयानन्द सरस्वती जी आर्य समाज की स्थापना

 

दयानन्द जी ने सन 1875 गिरगाँव मुम्बई में आर्य समाज की नीव ,उनके अनुसार आर्य समाज के नियम समस्त प्राणिओ के कल्याण के लिए है ,मानव जाती का कल्याण करना उनका परम उदेश्य है ,उनका लक्ष्य सनातन धर्म का प्रचार प्रसार था ,शुरुआत में कई लोग उनसे जुड़ते गए और कई पाखंडी लोग उनके विरोधी भी बन गए ,

स्वामी दयानन्द सरस्वती  जी संस्कृत के महान बिद्वान.

स्वामी जी बचपन से ही संस्कृत का अध्ययन करते थे इसलिए बहुत आसानी से वेदों को पढ़ लेते थे ,समय के साथ वो संस्कृत के महान विद्वान बन गए उन्होंने कई जगह भ्रमण कर के सनातन वैदिक धर्म का प्रचार किया ,शुरुआत में वो संस्कृत में प्रवचन देते थे ,किसी साजन के कहने पर उन्होंने हिंदी भाषा में व्याख्यान करना शुरू किया ,ताकि विद्वानों के साथ साथ साधारण मानव भी उनकी बात को समझ सके ,स्वामी महान तार्किक भी थे कोई भी उनके आगे टिक न पाता , उन्होंने सत्य प्रकाश नामक ग्रथ लिखा जिसकी आलोचना तथा ख्याति एक साथ हुयी .

स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के साथ हुआ था षड्यंत्र

पूर्ण आत्म ज्ञानिओ की तरह स्वामी जी का देहांत भी षड्यंत्रकारिओ द्वारा हुआ,किस शत्रु ने स्वामी जी के रसोइये के साथ मिल कर स्वामी जी के भोजन में कांच का चूरन मिला कर खिला दिया जिस कारण उसकी तबियत बहुत बिगड़ गयी ख़फ़ी इलाज के बाद भी कोई सुधर न हुआ ,30 अक्टूबर 1886 को दिवाली संध्या को उन्होंने इस मृत्यु लोक से प्रस्थान कर गए .




 

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