वास्तु शास्त्र  और दिशाओं का महत्व , इस दिशा से आती है लक्ष्मी

वास्तु शास्त्र और दिशाओं का महत्व , इस दिशा से आती है लक्ष्मी





वास्तु शास्त्र और दिशाओं का महत्व , वास्तु अनुसार दिशाएं 8 होती है ,पूर्व,पश्चिम,उतर ,दक्षिण,ईशान ,आग्नेय ,नैऋत्य ,वायव्य .इन्ही आठ दिशाओं में वास्तु का रहस्य छुपा हुआ है . आप घर के निर्माण में कितना पैसा खर्च करते है ,हर एक सुख सुबिधा का ख्याल रखते है, लेकिन  घर बनाने से पहले वास्तु का ध्यान न रखा जाये तो उस घर में रहने वाले लोगो को मानसिक शांति कभी नहीं मिल सकती .वास्तु शास्त्र हमें सिखाता है के हमारा घर का मुख्य द्वार किस दिशा में होना चाहिए . मंदिर किस दिशा में होना चाहिए ,स्नान घर , रसोई घर , तिजोरी .आदि किन दिशाओं में शुभ होती है और किन दिशाओं में नुक्सान दायक .

वास्तु शास्त्र और दिशाओं का महत्व ( दिशा ज्ञान से खुलते है किस्मत के दरवाजे )

1…उतर दिशा का ज्ञान –

उतर दिशा का देवता कुबेर है ,जो धन सम्पदा और समृद्धि का मालिक है ,ज्योतिष शास्त्र अनुसार बुध उतर दिशा का स्वामी है .उतरी भाग खुला होने पर ये धन , धान्य में वृदि करता है . इस दिशा की तरफ खिड़की या दरवाजा होना चाहिए ,अगर आप अपने व्यापर में वृद्धि चाहते है तो अपने व्यवसाय के उतरी हिस्से का वास्तु देख लें ,

उतरी भाग के वास्तु दोष का अर्थ है व्यापार में घाटा , नुक्सान ,या ग्राहकों का दुकान में प्रवेश न करना .,क्यों के बिज़नेस का उदेश्ये ,लाभ कमाना होता है .,इस लिए हर प्रकार के व्यापर के लिए .उतर दिशा का खास महत्व है .बुध ग्रह  सभी प्रकार के व्यवसाय को नियंत्रित करते है ,अगर आपके व्यवसाय के उतरी भाग का वास्तु अच्छा है तो आपके लिए कुबेर के खजाने सदा के लिए खुले रहेंगे .

2…पूर्व दिशा –

पूर्व दिशा का सम्बन्ध इन्दर देव से है यहाँ सूर्ये का उदय होता है .,पूर्व वंश वृद्धि की दिशा है .किसी भी सरचना का निर्माण करते समय पूर्व दिशा का स्थान खुला छोड़ना चाहिए , ऐसा करने से घर के बड़े बजुर्ग और मालिक को लम्बी उम्र प्रदान करता है ,सूर्ये की पहली किरणे शुभ मानी जाती है ,घर के अंदर सूर्ये की पहली किरणे पूर्व की और से आने का मतलब है के आपके घर में सकारत्मक ऊर्जा का परवाह आ रहा है .
व्यवसाय या दुकान का मुख्य द्वार पूर्व की और होना चाहिए ,अगर नहीं है तो .खिड़की या रोशन दान पूर्व की तरफ जरूर होना चाहिए.ताकि सूर्य की पहली किरणे प्रवेश कर सकें

3…पश्चिम दिशा का महत्व –

ज्योतिष अनुसार पश्चिम दिशा का स्वामी शनि है .वास्तु शास्त्र में पश्चिम दिशा का स्वामी वरुण देव है .ये दिशा नौकरी में सफलता . कारोवार ,यश . गौरव सोभाग्ये प्रदान करती है .इस दिशा में सकारात्मक ऊर्जा का अर्थ है आपकी कीर्ति में वृद्धि .
इस दिशा में स्नान घर बनाया जा सकता है ,भोजन कक्ष भी इसी दिशा में होना चाहिए .इस दिशा में घर का मंदिर कभी न बनाये अन्यथा घर के मुखिया और सदस्यों को मानसिक परेशानियां हो सकती है .इज़्ज़त यश मान में कमी आ सकती है .

4…दक्षिण दिशा का महत्व –

वास्तु अनुसार इस दिशा का देवता यम है .घर या व्यावसायिक निर्माण में इस दिशा का ख़ास ध्यान रखा जाता है ,वास्तु अनुसार निर्माण करवाने से ये दिशा .सफलता , विजय ,सुख एंवम मानसिक शांति प्रदान करती है .इस दिशा में घर का कीमती सामान ,अनाज भंडारण , या बेड रूम होना चाहिए ,
इस दिशा की तरफ मुख्य द्वार नहीं होना चाहिए ,अन्यथा गुप्त शत्रुओं का भय रहेगा ,अगर किसी कारन वश मुख्य द्वार दक्षिण की तरफ है तो उसे जरुरत पड़ने पर ही खोले ,अन्यथा बंद रखे .

5…ईशान कोण का महत्व –

ये दिशा उतर और पूर्व के बीच का भाग होता है .ये जल का क्षेत्र है ,इस दिशा के स्वामी शिव है ,इस दिशा में ,पानी का स्तोत्र होना शुभ मन जाता है .अगर आप शहरो में रहते है तो इस दिशा में भूमि गत टंकी बना लेनी चाहिए ,ज्योतिष अनुसार इस दिशा के स्वामी वृहस्पति है .इस लिए इस दिशा का महत्व और अधिक बढ़ जाता है ,




इस दिशा के शुभ होने का मतलव है घर के बच्चों का शिक्षा में सफलता प्राप्त करना ,इस दिशा को जितना ज्यादा पवित्र रखा जाये उतना ही घर में परिवार और व्यापर में सफलता मिलती है .इस दिशा में देवताओं का वास मन जाता है .घर का मंदिर इसी दिशा में बनाना चाहिए .

6…आग्नेय दिशा और उसका महत्व  

ये दिशा दक्षिण और पूर्व के मध्य भाग है .इस दिशा का देवता अग्नि है इस लिए इस दिशा को आग्नेय कहते है .ज्योतिष अनुसार इस दिशा का स्वामी शुक्र है .अगर ये दिशा सशक्त हो तो समाजिक प्रतिष्ठा,,व्यावसायिक उनती ,प्रदान करता है .अग्नि को ऊर्जा भी कह सकते है ,इस लिए घर में इस दिशा में ख़ास महत्व होता है .

कार्यक्षेत्र में ये स्थान शुद्ध होने पर कर्मचारिओं में उत्साह देखा जा सकता है ,अन्यथा आपके कर्मचारी अलसी हो सकते है अगर आपके घर का आग्नेय कोण शुद्ध है तो आप उर्जाबान रहेंगे .आपके घर का रसोई इसी दिशा में होना चाहिए .

7…नैऋत्य दिशा –

दक्षिण और पश्चिम के बीच के भाग को नैऋत्य दिशा कहते है .इस बाहग में पूतना का स्वामित्व है .ज्योतिष में इस दिशा को राहु का अधिपतये कहते है .पृथ्वी तत्व की प्रधानता होने के कारण इस भाग को हमेशा ऊँचा और भरी होना चाहिए . इस भाग मे आपके घर का स्टोर होना शुभ रहता है .

सैप्टिक टैंक, बोरिंग ,पानी का टैंक . आदि इस दिशा में नहीं बनाये जाने चाहिए . इस दिशा में खिड़की दरवाज़े न हो तो अच्छा है अन्यथा घर के सदस्य .वहम का शिकार हो सकते है ,पूतना और राहु केतु राक्षश है . इस लिए इस दिशा की तरह कोई शुद्ध वस्तु रखनी चाहिए जिस से यहाँ से वहने बाली हवा का शुद्धि कारण हो सके .

8…वायव्य दिशा का महत्व –

उतर और पश्चिम दिशा के बीच के भाग को वायव्य दिशा कहते है .ये यवायु का क्षेत्र है .ज्योतिष अनुसार इस भाग के स्वामी चंद्र है .वायु और चंद्र की गति तेज होती है .अगर आप सम्पन परिवार से है तो आपके नौकरों का कमरा इसी दिशा में होना चाहिए ,व्यवसाय में इस जगह पर रखा गया सामान शीघ्रता से विक्री होता है .




इस दिशा का सम्बन्ध मित्रो और शत्रुओं से होता है . अगर आपके व्यवसायक क्षेत्र में ये स्थान अशुभ है तो आपके सनझदारी आपको धोखा दे सकते है . इस स्थान को शुभ रखना अति आवश्यक है ,नहीं तो आपके मित्र कब आपके शत्रु बन जाये पता नहीं चलेगा .




दोस्तों वास्तु शास्त्र का ये मेरा पहला लेख है अगर आपको अच्छा लगे तो अपने मित्रों के साथ शेयर करे .whatsapp .facebook पर शेयर करे ताकि जो लोग इन परेशानिओ से जूझ रहे है उनका भला हो सके , मैं वास्तु शास्त्र के और भी बहुत सारे गुप्त रहस्य आपके लिए लाता रहूँगा .

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