चयवनप्राश  एक अद्भुत रहस्यमई  पौराणिक कथा-Chyavanprash, a wonderful mysterious mythology

चयवनप्राश एक अद्भुत रहस्यमई पौराणिक कथा-Chyavanprash, a wonderful mysterious mythology





 चयवनप्राश एक अद्भुत रहस्यमई पौराणिक कथा भारत का इतिहास खोलो तो ऐसे- ऐसे रहस्य पूर्ण पहलु सामने आ जायेंगे जिको सुन कर रोंगटे खड़े हो जाते है , चय्वनप्राश का नाम किसने नहीं सुना , आज भारत में चय्वनप्राश हेल्थ टॉनिक के रूप में बहुत परिसद हो चूका है ,लेकिन क्या आप जानते है के चयवनप्राश के इतिहास में ,रहस्य पूर्ण ,त्याग , वैराग्ये , दुःख भरी पौराणिक कथा छुपी है .

बहुत पुराणी बात है, भारत में एक राजा जिसका नाम शर्याति था जो बहुत ही धार्मिक प्रवृति का होने के कारन , प्रजा की रक्षा करना उसका पर्व धर्म बन गया था , एक समय की बात है राजा अपनी कन्याओं के साथ ऋषिओं के आश्रम में भ्रमण करने गया , उस जमाने में मंदिर नहीं हुआ करते थे ,

भरमन करते हुए जब वो एक ऋषि के आश्रम में पहुंचे तो वहां का वातवरण देख कर बही विश्राम करने लगे , राजा की कन्याये बही खेलने लगी खेलते खेलते राजा की एक कन्या समीप के एक बंकी तरफ चली गयी , वहां उसे एक मिटटी का ढेर नज़र आया .जिसमे दो चमकदार मोती जैसी कोई चीज उसे दिखाई दी राजा की कन्या ने उत्सुकता वश उसको समीप से देखना चाहा ,और फिर समीप पड़े एक कांटे से उसको छूने लगी .

ये क्या जैसे ही उसने उस चमकदार चीज को कांटे से छुआ तो उसमे से पानी निकलने लगा ,और चिल्लाने की आवाज आने लगी .कन्या वहां से भाग कर अपने पिता राजा शर्याति के पास आ गयी . तब तक राजा भी बापस अपने महल की तरफ चलने के लिए त्यार हो गया था .Chyawanprash

राजा सपरिवार बापिस आ कर अपने राजपाठ में व्यस्त हो गया .कुछ दिनों बाद उसकी प्रजा में एक गंभीर वीमारी लग गयी , जो महामारी की तरह फैलने लगी ,लोगो का मॉल मूत्र बंद होने लगा ,मानव तो क्या जानवर भी इसकी चपेट में आने लगे .राजा ने अपने मंत्रीओ के साथ बैठ कर विचारविमर्श किया के इस बीमारी का कारन क्या है ,सभी वैद और ज्ञानी ,इसका भेद जानने में असफल रहे ,

अपने पिता को दुखी देख कर सुकन्या ने अपने पिता को आश्रम की सारी कहानी सुना दी के किस तरह से उसने किसी चीज को कांटे से छुआ तो उसमे से पानी निकलने लगा और रोने चिल्लाने की आवाज़ आने लगी . राजा ने तुरंत अपने राज्ये के ज्ञानिओ को बुला कर सारी बात बता दी ,तब उनमे से किसी ने बताया के उस आश्रम में बहुत समय पहले एक ऋषि समाधि में बैठ गए थे ,वर्षो समाधि में बैठने के कारन उसके ऊपर मिटटी और बामी का ढेर बन गया था .

शायद उनको जो कष्ट हुआ है उस कष्ट के कारन हमारे राज्य की प्रजा में माहमारी फ़ैल गयी है.राजा ने फैसला किया के हम सभी उन ऋषि के आश्रम में जाकर उनसे क्षमा याचना करेंगे , आश्रम पहुंचा कर राजा ने देखा एक मिटटी के ढेर से पानी निकल रहा है , सैनको ने उस ढेर को धीरे धीरे साफ़ करना शुरू किया तो उसमे से ऋषि सामने आ गए लेकिन सुकन्या की नसमझी के कारन ऋषि की आंखे फुट चुकी थी .




ऋषि अंधे हो चुके थे .अब राजा घबरा गया के क्षमा मांगे भी तो कैसे , राजा ने ऋषि से क्षमा याचना करनी चाही तो ऋषि बोले अब मैं बूढ़ा हो गया हु .मेरी समाधि भी भंग हो गयी है अब बुढ़ापे में मेरी सेवा कौन करेगा .राजा ने कहा मेरे सैनिक आपकी सेवा में दिन रात रहेंगे .ऋषि ने कहा के तुम्हारे सैनिको की क्या गलती है

जिसने ये घोर कर्म किया है उसको मेरी सेवा में लगाते उसके कर्मो का बोझ भी कम हो जायेगा . ऋषि बोले उसको मेरी अर्धांग्नी बना दो ताकि वो मेरी सेवा क

Chyawanprash

र सके ,क्यों के पत्नी के सिवा पति की सेवा कोई नहीं कर सकता और पत्नी ही सच्चे मन से पति की सेवा करती है .

अब राजा दुबिधा में फस गया और न उसने ना कही और न ही हां में सर हिलाया वो अपने महल में बापिस आ गया .बहुत दुखी रहने लगा उधर उसकी प्रजा भी महामारी के कारन मरने लगी . राजा ये सोच कर दुखी रहने लगा के मैं अपनी सुन्दर कन्या का विवाह एक गरीब और बूढ़े वियक्ति के साथ कैसे कर दूँ ,पिता का फ़र्ज़ होता है के अपनी कन्या का विवाह ऐसी जगह करवाए जहा उसकी कन्या सुखी रहे ,तो बन में उस ऋषि के आश्रम में उसको कोण सा सुख मिलेगा पिता के दुःख को देख कर सुकन्या बोली के पिता जी मैं ऋषि के आश्रम में जाने के लिए त्यार हु ,

 

मेरे इस कार्य से सारी प्रजा का रोग दुःख दूर हो जायेगा राजा ने उस वृद्ध ऋषि के साथ सुकन्या का विवाह करवा दिया ,अब वो राजकुमारी उन ऋषि (ऋषि का नाम च्यवन था )के आश्रम में रह कर ,वनवासी जीवन वयतीत करने लगी .गर्मिओ में उनको पत्तो से हवा करती और सर्दिओं में बन की लकड़िओं से पानी गरम कर के अपने ऋषि पति को देती . सुबह जल्दी उठ कर ताजा फल और कंदमूल इक्ठा कर के अपने पति को खिलाती ,

शाम को टिन्नी के चावल पका कर उनको भोग लगाती .इसी तरह महलो में पली बड़ी एक राजकुमारी सिर्फ और सिर्फ अपने देश की प्रजा के लिए इतने दुःख सहने लगी . ऋषि को भोजन और ध्यान के लिए आसान पर बैठाने तक सारा काम सुकन्या करती थीएक बार उनके आश्रम में सूर्ये के दोनों पुत्र अश्विनी कुमार पधारे , अश्विनी कुमार देवताओं के वैद(docter) है .




 

क्या भगवान नास्तिक को सजा देते है

16 सोमबार व्रत तथा शिव  पूजन विधि

क्या भगवान नास्तिक को सजा देते है

जब उन्होंने राजकुमारी को एक वृद्ध पति की सेवा करते देखा तो .उन्होंने सुकन्या की परीक्षा लेनी चाही .अश्विनी कुमार बोले .हे देवी हम तुम्हारे पति को अपनी तरह जवान और स्वस्थ बना देंगे , फिर हम तीनो के रंग रूप में कोई अंतर् नहीं होगा , अगर तुमने तीनो में से अपने पति को पहचान लिया तो ,तुम्हारा पति हमेशा जवान रहेगा ,अन्यथा फिर से वृद्ध हो जायेगा .Chyawanprash

राजकुमारी सुकन्या ने ये सारी बात अपने पति को बता दी .ऋषि बोले अश्विनी जल्दी से कुमार को मेरे पास लाओ ,और जैसा सूर्ये पुत्र बोले उनकी आज्ञा मान लो , अश्विनी कुमार ने एक कुंड बनवाया फिर तीनो उस कुंड में चले गये , कुछ पल के बाद जब तीनो बहार निकले तो तीनो का रूप रंग एक समान था दोनों अश्विनी कुमारों और ऋषि में कोई अंतर् न था . सभी के चेहरे से तेज निकल रहा था .

 

सुकन्या तीनो को देख के घबरा गयी के अब तीनो में से अपने पति को कैसे पहचानू .अगर गलत निर्णय ले लिया तो मेरे पति फिर से बूढ़े हो जायेंगे . ऋषि पत्नी ने माँ जगजननी की कृपा से अपने ऋषि पति को पहचान लिया , अश्विनी कुमार सुकन्या के पतिव्रता धर्म से बहुत खुश हुए और जाते हुए ऋषि को एक प्राश बनाने की विधि बता गए कुमार बोले हे ऋषि इस प्राश को खाने से तुम्हारा यौवन वर्षो तक स्थिर रहेगा

,इस तरह से च्यवन ऋषि के नाम से आज भी चयवनप्राश के नाम से प्रसिद्ध है . मित्रो आपको ये कथा अगर पसंद ए तो अपने whatsapp में शेयर करें . धन्यबाद

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