अमृत जो मृत्यु से परे हैं -रहस्य और अध्यात्म

अमृत जो मृत्यु से परे हैं -रहस्य और अध्यात्म





अमृत (सोम रस) जो मृत्यु से पर हैं ,ऐसा कोई बिरला ही होगा जिसने अमृत क नाम न सुना हो ,धार्मिक कहानिओ ग्रंथो ,में भी अमृत की चर्चा मिल जाती हैं के देवताओं ने अमृत पिया वो अमर हो हो गये ,अमर जो मृत्यु से परे हैं ,जिसको कभी मृत्यु नहीं आती ,क्या ये बात सत्ये हैं या कोरी कल्पना ,या हम आँख मूँद कर अपनी मान्यताओं पर विश्वास कर रहे हैं .कई लोग सोम रस को किसी प्रकार के नशे से जोड़ देते हैं जो की सरासर गलत और सनातन मान्यताओं का अपमान हैं

अमृत




सोम रस क्या हैं जिसको पीने से मानव मृत्यु से परे हो जाता हैं, क्या सोम रस मुख द्वारा पिया जाता हैं या इसका कोई रहस्य हैं जिसको हमने कभी खोजा नहीं और न कभी समझने की कोशिश की .

कहते हैं देवताओं ने अमृत पिया हैं इस लिए वो अमर हैं ,कभी मरते नहीं लेकिन मृत्यु तो सिर्फ धरती पर आती हैं ,पृथ्वी को मृत्यु लोक कहते हैं इसका तातपर्य ये हुआ के देवता भी पृथ्वी पर जनम (avtar )लिए होंगे ,और उन्होंने अमृत की खोज की होगी मृत्यु से पार पाने के लिए .

क्या सिर्फ देवताओं ने ही सोम रस पिया था ऋग्वेद में बताया गया हैं ,ऋषिओं ने भी अमृत प्राप्त किया था , ऋषि कहते हैं के हमने सोम रस को प्राप्त कर लिया हैं सोम रस पी कर हम अमरता को प्राप्त कर चुके हैं ,सोम रस ने हमें जनम मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दिया हैं ,अत अब हमने ब्रह्म की दिव्ये शक्तिओं को जान लिया हैं उसके अलौकिक रूप को देख लिया हैं .

(ऋग्वेद: 8/48/3)

क्या कलियुग में अमृत मिल सकता हैं , अगर हाँ तो कैसे

सबसे पहले हम अपनी मान्यताओं को छोड़ कर धार्मिक शाश्त्रो और ग्रंथो के मार्ग पर अग्रसर होना हैं जिसमे अमृत कहाँ मिलता हैं कैसे प्राप्त किया जाता हैं ये बताया गया हैं कुछ लोग कहते हैं अमृत समुन्दर मंथन से निकला था




ऋग्वेद में बताया गया हैं के जिस सोम  की महिमा वेदो में ईश्वर को जानने वालो ने गाई हैं ,वो सोम रस मुख द्वारा पिया ही नहीं जा सकता ,वो सोम रस तो आध्यात्मिक अनुभव द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता हैं . (ऋग्वेद:10/85/3)

कबीर जी कहते हैं
गगन मंडल अमृत का कुआ जहा ब्र्ह्म का वासा ||
सगुरा होव भर भर पीवे निगुरा मरत प्यासा ||

कबीर जी ने किस कुए की बात की थी ,गगन मंडल किसे कहा ,क्या आसमान में कोई कुआँ हैं कबीर जी तो कभी अंतरिक्ष में गए नहीं तो . यहाँ कबीर जी ने दसम द्वार को गगन कहा हैं , उसके अंदर ब्रह्म अर्थात ईश्वर का वास हैं उनके कहने का तातपर्य था के मानव इस शरीर के अंदर से सोम रस की प्राप्ति कर सकता हैं ,इसी देह  के अंदर ईश्वर हैं .

अब ये बात सिद्ध हो गयी हैं के अमृत कहीं बाहर से नहीं आपके शरीर के अंदर से प्राप्त कर सकते हैं .इसकी विधि क्या हैं , जिस तरह से देवताओं ने समुन्दर मंथन किया था उसी तरह हमे भी अपने मन का मंथन करना होगा निरंतर ध्यान के द्वारा , जैसे – जैसे हम ध्यान में अग्रसर होते जायेंगे हमे कई अनुभूतियाँ होती जाएँगी .कभी तेज प्रकाश तो कभी अनहद वाणी अंत में जब समाधि की अवस्था में पहुँच जायेंगे तब हम उस अमृत को प्राप्त कर लेंगे जिसे मोक्ष भी कहते हैं .
इस बात को समझना जितना आसान हैं प्राप्त करना उतना ही कठिन .



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